"किसी भी राष्ट्र की संपदा उसमें पडे हुए धन से नहीं बल्कि उसके शिक्षा तंत्र से होती है |"
"आज जो संस्कृति करोड़ों वर्षों से सैकड़ों आक्रमणों एवं कई सदियों की गुलामी के बावजूद भी अपने और अधिक प्रचण्ड स्वरूप में खड़ी है तथा जिस संस्कृति के लोग अपनी योग्यताओं एवं विशेषताओं से संपूर्ण विश्व में अपना परचम फहरा रहें हैं तो यदि इसका श्रेय यदि किसी को जाता है तो वह इसके शिक्षकों को जाता है |"
"एक कच्ची बस्ती में रहने वाले बालक जिसको ये तक मालूम नहीं था कि उसके आने वाले कल में वह जीवित भी रह पाएगा या नहीं, उस बालक को वहाँ से उठाकर 84 लाख वर्ग किलोमीटर के भूभाग का राजा बना देने का काम यदि किसी ने किया तो वह एक शिक्षक ने किया है | शायद आप समझ गए होंगे कि मैं किस की बात कर रहा हूँ, जी हाँ मैं चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त की बात कर रहा हूँ | एक शिक्षक क्या कर सकता है, इस बात का अंदाजा तो आपने चाणक्य के उदाहरण से लगा ही लिया होगा |
शिवाजी, महाराणा प्रताप, वीर बन्दा बैरागी, विवेकानन्द और न जाने कितने सारे अनगिनत योद्धा हमारे गुरुओं ने हमें दिये है |
गुरू का महत्व क्या है हमारी संस्कृति में इसका प्रदर्शन करता हुआ एक बहुत सुन्दर श्लोक.. 
"गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥"

 भावार्थ :
गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम ।


"किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि शतेन च । दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः विना गुरुकृपां परम् ॥

 भावार्थ :
बहुत कहने से क्या ? करोडों शास्त्रों से भी क्या ? चित्त की परम् शांति, गुरु के बिना मिलना दुर्लभ है ।"

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय  
बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताय"

एेसे महान संस्कृति सच में यदि जीवित तो वह भगवान के रुप में हमारे सामने खडे साक्षात गुरु की वजह से ही जीवित है | 

2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में दिया लार्ड मैकाले का भाषण-
"मैंने भारत की ओर-छोर की यात्रा की है पर मैंने एक भी आदमी ऐसा नहीं देखा जो भीख माँगता हो या चोर हो। मैंने इस मुल्क में अपार सम्पदा देखी है। उच्च उदात्त मूल्यों को देखा है। इन योग्यता मूल्यों वाले भारतीयों को कोई कभी जीत नहीं सकता यह मैं मानता हूँ, तब तक; जब तक कि हम इस मुल्क की रीढ़ ही ना तोड़ दें, और भारत की रीढ़ है उसकी आध्यात्मिक और साँस्कृतिक विरासत। इसलिए मैं यह प्रस्ताव करता हूँ कि भारत की पुरानी शिक्षा व्यवस्था को हम बदल दें। उसकी सँस्कृति को बदलें ताकि हर भारतीय यह सोचे कि जो भी विदेशी है वह बेहतर है। वे यह सोचने लगें कि अंग्रेजी भाषा महान है, अन्य देशी भाषाओं से। इससे वे अपना सम्मान खो बैठेंगे। अपनी देशज जातीय परम्पराओं को भूलने लगेंगे और फिर वे वैसे ही हो जाएँगे जैसा हम चाहते हैं, सचमुच एक आक्रान्त एवं पराजित राष्ट्र।"
-लार्ड मैकाले
ठीक एेसा ही उन्होंने किया व हम पर शासन किया व हमारी संस्कृति में जो गुरूओं का स्थान था, उसे उखाड़ फेका तथा नया शिक्षा तंत्र को लागू किया, जिसके दुष्परिणाम आज हम करोडों लोगों के बेरोजगार , हत्या, चोरी, डकैती एवँ एेसे असंख्य अपराधों के रूप में हमारे इस महान भारत में देखते हैं जिसमें अफसोस कि, पढ़े लिखे लोग की भागीदारी ज्यादा होती है |
17 साल से ज्यादा पढने के बाद जब वह कॉलेज में जाता है तो वहाँ उसे एथिक्स यानी शिष्टाचार का पाठ पढाना पड़ता है |
वर्तमान भारत में शिक्षक दिवस 5 सितम्बर यानी आज ही के दिन हमारे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति एवं द्वितीय राष्ट्रपति के जन्मदिन पर मनाया जाता है | 
जिन्होंने ने यह साबित किया है कि प्राचीन काल में ही नहीं, अपितु आज भी शिक्षक उतने ही कर्मठता के साथ आगे बढ़ने को तैयार है |
इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि शिक्षा तंत्र में कमी के कारण 72 वर्षों की स्वतंत्रता के बावजूद विकसित नहीं बन पाया, तथा जिन मानवीय मूल्यों को युवा पीढी में समाहित करना था वो नहीं कर पाया ,जिसके परिणाम कि अपराधों में शिक्षितों का अशिक्षितों की तुलना में ज्यादा होने के रूप में सामने आता है परंतु देश हित में लगे हुए गुरूओं के कारण तमाम कुरीतीयों एवम् अन्धविश्वासों के बावजूद काफी तेज रफ्तार से भारत विकास के पथ पर अग्रसर है |
वर्तमान शिक्षा तंत्र में हर एक शिक्षक को यह शपथ लेनी चाहिए कि भारत माँ का वही जगद्गुरू का आसन पुन: दिलाया जाए तथा छात्रों का यह उत्तरदायित्व बनता हैं कि वे नया कीर्तिमान कायम करें व समाज में शिक्षकों के प्रति एक सम्मान की भावना का विकास में शत प्रतिशत सहयोग करें|

तुषार खंडेलवाल