फ़ल्सफ़ा यह मेरा की मक्दूर तूने तारो के नाम कर दिया 
मेरे जैसे ग़म-गुसार को मुश्त-ए-ख़ाक कर दिया 
बसीरत दी मैंने फिर भी उस रात आसमान को  
देखते ही तेरे तोहमत ज़लील हो गए 
क्युकी यहाँ पर तो सिर्फ बादल ही बादल थे